Varnmala In Hindi | हिन्दी भाषा एवं वर्णमाला

varnmala in hindi | hindi varnamala | हिंदी वर्णमाला

भाषा क्या है ?

भावों को अभिव्यक्त करने के माध्यम को भाषा कहते है। हिन्दी भाषा मूलतः आर्य परिवार की भाषा है। इसकी लिपि देवनागरी है जिसका विकास ब्राह्मी लिपि (इसी लिपि में वैदिक साहित्य रचित) से हुआ। हिन्दी के विकास में वैदिक संस्कृत, लौपिक संस्कृत पाली, प्राकृत, अपभ्रंश एवं विदेशी भाषाओं-अरबी, फारसी आदि का योगदान है।

वर्ण

भाषा की सबसे छोटी मौखिक ध्वनि या उसके लिखित रूप को वर्ण कहा जाता है। वर्ण का अर्थ अक्षर भी है जिसका अर्थ-अनाशवान है। अत: वर्ण अखंड मूल ध्वनि का नाम है। जिसके खण्ड नहीं हो सकते।

वर्णमाला

किसी भाषा के मूल ध्वनियों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं।

स्वर 

  • वे वर्ण जिनके उच्चारण के लिए किसी अन्य वर्ण की आवश्यकता नहीं होती स्वर कहलाते है। इसकी संख्या (उच्चारण दृष्टि) 11 है।  जैसे-अ,आ,इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ए,ऐ,ओ,औ।
  • अनुस्वार-अ (-:)
  • विसर्ग-अ (:)
  • अग्र स्वर-जिन स्वरों के उच्चारण में जिहूवा का अग्र भाग सक्रिय होता है, इन्हें अग्रस्वर या आगे के स्वर कहा जाता है। जैसे-ई,ए,ऐ,अ,इ
  • पश्व स्वर-जिन स्वरों के उच्चारण में जिहूवा का पश्च भाग सक्रिय होता है उन्हें पश्च स्वर या पीछे के स्वर कहा जाता है। जैसे-आ,उ,ऊ,ओ,औं।
  • संवृत स्वर-संवृत शब्द का अर्थ होता है-कम खुलना जिन स्वरों के उच्चारण में मुख कम खुलता है-उन्हें संवृत्त स्वर कहते हैं-जैसे-ई,ऊ। 

ओष्ठाकृति के आधार पर स्वरों के भेद

  • वृत्ताकार स्वर-जिन स्वरों के उच्चारण में होठों का आधार गोल हो जाता है, उन्हें वृत्ताकार स्वर कहते हैं। | जैसे-उ, ऊ, ओ, औ।
  • अवृत्ताकार स्वर-जिन स्वरों के उच्चारण में होंठ गोल न होकर अन्य आकार में खुलें उन्हें अवृत्ताकार स्वर कहते हैं। 

उच्चारण समय के आधार पर स्वर भेद

  • हस्व स्वर-जिन स्वरों के उच्चारण में एक मात्रा का समय अर्थात् सबसे कम समय लगता है, उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं। उदाहरण-अ.ई. उ
  • दीर्घ स्वर-जिन स्वरों के उच्चारण में दो मात्राओं का या एक मात्रा से अधिक समय लगता है, इन्हें दीर्घ स्वर कहते है। उदाहरण-आ,ई,ऊ,ऐ,ए
  • प्लुत स्वर-जिन स्वरों के उच्चारण में दो मात्राओं से भी अधिक समय लगे, उन्हें प्लुत, स्वर कहते हैं। जैसे-ओम में ओ को दीर्घ स्वर से अधिक खीचने पर ओउम् लिखा जाता है।
  • स्वर भेद का महत्व-हिन्दी में स्वरों का ज्ञान होना अनिवार्य है। स्वरों के भेद का सही ज्ञान न होने पर उच्चारण में ही नहीं अपितु अर्थ में भी परिवर्तन हो जाता है। 
हस्व स्वरदीर्घ स्वर
कुलकूल
ओरऔर
खोलखौल
जातिजाती

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