रस | Ras in Hindi | रस के भेद एवं उदाहरण | परिभाषा | प्रकार

रस काव्य का मूल आधार ‘ प्राणतत्व ‘ अथवा ‘ आत्मा ‘ है रस का संबंध ‘ सृ ‘ धातु से माना गया है। जिसका अर्थ है जो बहता है , अर्थात जो भाव रूप में हृदय में बहता है उसे को रस कहते हैं।

एक अन्य मान्यता के अनुसार रस शब्द ‘ रस् ‘ धातु और ‘ अच् ‘ प्रत्यय के योग से बना है। जिसका अर्थ है – जो वहे अथवा जो आश्वादित किया जा सकता है।

रस की परिभाषा

इसका उत्तर रसवादी आचार्यों ने अपनी अपनी प्रतिभा के अनुरूप दिया है। रस शब्द अनेक संदर्भों में प्रयुक्त होता है तथा प्रत्येक संदर्व में इसका अर्थ अलग – अलग होता है।

रस के भेद

रस के भेद है:

  • श्रृंगार रस – Shringar Ras
  • हास्य रस – Hasya Ras
  • रौद्र रस – Raudra Ras
  • करुण रस – Karun Ras
  • वीर रस – Veer Ras
  • अद्भुत रस – Adbhut Ras
  • वीभत्स रस – Veebhats Ras
  • भयानक रस – Bhayanak Ras
  • शांत रस – Shant Ras
  • वात्सल्य रस – Vatsalya Ras
  • भक्ति रस – Bhakti Ras

श्रृंगार रस 

-इसका स्थाई भाव रति है

  • नायक नायिका के सौंदर्य तथा प्रेम संबंधी वर्णन को श्रंगार रस कहते हैं श्रंगार के दो भेद होते हैं

संयोग श्रृंगार

  • जहां नायक-नायिका के मिलन का वर्णन होता है वहां सहयोग श्रंगार होता है |
  • जैसे बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय, कहां करें, भौंहनी हंसे, दैन कहै, नटि जाय |

वियोग श्रृंगार 

  • जहां नायक-नायिका की वियोगावस्था (विरह) का वर्णन होता है वहां वियोग श्रृंगार होता है |

जैसे निस दिन बरसत नैन हमारे | सदा रहत पावस ऋतु हम पे जबते स्याम सिधारे |

हास्य रस

इसका स्थाई भाव हास है

  • जहां विकृत आकार, वेश-भूषा, चेष्टा आदि के वर्णन से उत्पन्न हास्य को हास्य रस कहा जाता है |
  • जैसे – तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेम प्रताप,  साज मिले पंद्रह मिनट, घंटा भर आलाप, घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता,  धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता 

करुण रस 

स्थाई भाव शौक है

  • किसी प्रिय व्यक्ति के चिन्ह बिरहा से उत्पन्न होने वाली चौक अवस्था के परिपाक को करुणा रस कहते हैं |
  • जैसे –  सोक विकल सब रोंवही रानी | रूपु सीलु बलु तेज बखानी | करहिं मिलाप अनेक प्रकार | परहिं भूमि तल बारहिं बारा ||

वीर रस

स्थाई भाव उत्साह है

  • उत्साह नामक स्थाई भाव जब विभावादी के संयोग से परिपक्व होकर रस रूप में परिणत होता है तब वही वीर रस होता है |
  • जैसे – वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो | सामने पहाड़ हो किसी की दहाड़ हो | तुम कभी रूको नहीं तुम कभी झुको नहीं ||

रौद्र रस

– इसका स्थाई भाव क्रोध है |

  • किसी व्यक्ति के द्वारा क्रोध में किए गए अपमान आदि से उत्पन्न क्रोध के भाव को रौद्र रस कहते हैं |
  • जैसे अविरत बोले वचन कठोर, बेगी देखाउ मूढ नत आजू | उलतऊँ माहि जंह लग तवराजू |

भयानक रस

– इसका स्थाई भाव भय है|

  • किसी भयानक दृश्य को देखने से उत्पन्न भय की अवस्था को भयानक रस कहते हैं |
  • जैसे उधर गरजती सिंधु लहरिया कुटिल काल के जालों सी | चली आ रही फेंन उगलती, फेंन फैलाएं व्यालो सी ||

वीभत्स रस

– इसका स्थाई भाव जुगुप्ता है

  • जुगुप्ता स्थाई भाव जब अनुभाव, विभाव आदि के द्वारा परिपक्व अवस्था में पहुंच जाए, वीभत्स रस कहलाता है |
  • जैसे – सिर पर बैठ्यो काग आंख दोउ खात निकारत खीचत जीभाहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत | गीध जांघि को खोदि-खोदि कै मांस उपारत स्वान आंगुरित काटी-काटी कै खात विदारत ||

अद्भुत रस

– इसका स्थाई भाव आश्चर्य है

  • आश्चर्यजनक वर्णन के द्वारा उत्पन्न निभावो की अवस्था को अद्भुत रस कहते हैं |
  • जैसे – देख यशोदा शिशु के मुख में सकल विश्व की माया | क्षणभर को वह बनी अचेतन हिल न सकी कोमल काया ||

शांत रस

– इसका स्थाई भाव निर्वेद है |

  • अनित्य और असार तथा परमात्मा के वास्तविक ज्ञान से विषयों के वैराग्य से उत्पन्न रस परिपक्व होकर शांति में परिणत हो जाता है |

जैसे – मन रे तन कागद का पुतला | लागे बूंद बिनसि जाय छिन में, गरब करें क्या इतना ||

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